जे जन रसिक चकोर, मीन चातक व्रत धारी ।
ते भल इहि मग चलैं, आन कोउ नहिं अधिकारी ॥
- श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी (196)
इस रस मार्ग में चलने के अधिकारी केवल वे रसिक जन हैं जो चकोर, मीन एवं चातक के समान अनन्य व्रत को धारण करते हैं । अनन्यता से विहीन अन्य जीव इस रस मार्ग के अधिकारी नहीं हैं।
ते भल इहि मग चलैं, आन कोउ नहिं अधिकारी ॥
- श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी (196)
इस रस मार्ग में चलने के अधिकारी केवल वे रसिक जन हैं जो चकोर, मीन एवं चातक के समान अनन्य व्रत को धारण करते हैं । अनन्यता से विहीन अन्य जीव इस रस मार्ग के अधिकारी नहीं हैं।

