इष्ट ही के रंग राँचै, इष्ट ही की कृपा जाँचै - श्री लाल स्वामी

इष्ट ही के रंग राँचै, इष्ट ही की कृपा जाँचै - श्री लाल स्वामी

(कवित्त)
इष्ट ही के रंग राँचै, इष्ट ही की कृपा जाँचै,
इष्ट विना और नहीं जाके हिय वासना। [1]
इष्ट ही कौ गावै जस, भावै इष्ट ही कौ रस,
इष्ट विना काहू की जु राखै मन आसना॥ [2]
इष्ट ही ते पावै मान, इष्ट बल बलवान,
इष्ट बिना चाहै मन कहूँ कौ निकासना। [3]
रस रुपी इष्ट धाम, ताहि में अटल वास,
याही कौं रसिक कहैं सुदृढ़ उपासना॥ [4]

- श्री लाल स्वामी

जो अपने इष्ट के ही प्रेम रंग में रंगा हो और अपने इष्ट की ही कृपा की याचना करता हो, जिसके हृदय में अपने इष्ट के अतिरिक्त कोई अन्य वासना न उत्पन्न होती हो। [1]

जो सदा अपने इष्ट का ही यशोगान करता हो, जिसे अपने इष्ट का ही रस प्रिय हो और जो अपने इष्ट के अतिरिक्त किसी और की मन से आशा न लगाये हो। [2]

जिसका सम्मान अपने इष्ट के द्वारा ही होता हो, जो इष्ट के बल से ही बलवान होता हो और जिसका मन अपने इष्ट के अतिरिक्त कहीं और नहीं ठहरता हो। [3]

जिसका अटल वास अपने इष्ट के रस रूपी धाम में हो। रसिक संत ऐसे लक्षण वाले व्यक्ति को ही सुदृढ़ (अनन्य) उपासक मानते हैं। [4]