मेरे मनहिं हुलास स्वामिनी श्रीवन सुरख लहोंगी - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (282)

मेरे मनहिं हुलास स्वामिनी श्रीवन सुरख लहोंगी - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (282)

(राग जैजैवंती)
मेरे मनहिं हुलास स्वामिनी, श्रीवन सुरख लहोंगी । [1]
कोर कटाक्ष विहारिनि तेरे, निधुवन कोन गहोंगी ॥ [2]
कवहुँक सेवाकुंज कदमतर, राधा नाम कहोंगी। [3]
फिरिफिरि श्रीवन ललितकिशोरी, अलि अरविंद रहोंगी ॥ [4]

- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (282)

हे स्वामिनी जू (श्री राधा)! मेरे मन में अति उल्लास भर चुका है कि अब मैं भी श्रीधाम वृंदावन में तुम्हारे सुकोमल लाल चरणों की छवि का दर्शन करूँगी। [1]

हे विहारिणी! तुम्हारी करुणा कटाक्ष से मैं भी निधिवन के कोने में वास करूँगी। [2]

कभी सेवाकुंज में कदम के वृक्ष के नीचे बैठकर “राधा” नाम का भजन करूँगी। [3]

श्री ललित किशोरी कहते हैं कि श्री वृन्दावन की कुंजों में ऐसे फिरा करूँगी जैसे एक भँवरा कमल के फूल के आस पास मंडराता रहता है । [4]