तुम मेरी राखो लाज हरि ।
तुम जानत सब अन्तर्यामी, करनी कछु ना करी ॥ [1]
अवगुन मोसे बिसरत नाहिं, पलछिन घरी घरी ।
सब प्रपंच की पोट बाँधि कै, अपने सीस धरी ॥ [2]
दारा सुत धन मोह लिये हौं, सुध-बुध सब बिसरी ।
सूर पतित को बेगि उबारो, अब मोरि नाव भरी ॥ [3]
- श्री सूरदास, सूर सागर
हे श्री कृष्ण, कृपया मेरी लाज रख लें। आप सर्वज्ञ हैं, सब कुछ जानने वाले हैं, मैंने कोई भक्ति नहीं की है। [1]
मेरे अवगुण मेरा पीछा छोड़ते नहीं, वे हर क्षण मेरे संग ही रहते हैं। मैं समस्त प्रपंच की पोटली को बांध कर सदा अपने सिर पर ढोता रहता हूँ। [2]
मैं पत्नी, बच्चों और धन के मोह में डूबा हुआ हूँ, सभी सुध-बुध खो बैठा हूँ। श्री सूरदास विनती करते हैं, हे प्रभु! मुझ पतित को जल्दी ही उबार लो क्योंकि अब मेरी नाव डूबने वाली है। [3]
तुम जानत सब अन्तर्यामी, करनी कछु ना करी ॥ [1]
अवगुन मोसे बिसरत नाहिं, पलछिन घरी घरी ।
सब प्रपंच की पोट बाँधि कै, अपने सीस धरी ॥ [2]
दारा सुत धन मोह लिये हौं, सुध-बुध सब बिसरी ।
सूर पतित को बेगि उबारो, अब मोरि नाव भरी ॥ [3]
- श्री सूरदास, सूर सागर
हे श्री कृष्ण, कृपया मेरी लाज रख लें। आप सर्वज्ञ हैं, सब कुछ जानने वाले हैं, मैंने कोई भक्ति नहीं की है। [1]
मेरे अवगुण मेरा पीछा छोड़ते नहीं, वे हर क्षण मेरे संग ही रहते हैं। मैं समस्त प्रपंच की पोटली को बांध कर सदा अपने सिर पर ढोता रहता हूँ। [2]
मैं पत्नी, बच्चों और धन के मोह में डूबा हुआ हूँ, सभी सुध-बुध खो बैठा हूँ। श्री सूरदास विनती करते हैं, हे प्रभु! मुझ पतित को जल्दी ही उबार लो क्योंकि अब मेरी नाव डूबने वाली है। [3]

