चम्पक वरन भूमि झूमि द्रुम फूले फले - ब्रज के कवित्त

चम्पक वरन भूमि झूमि द्रुम फूले फले - ब्रज के कवित्त

(कवित्त)
चम्पक वरन भूमि झूमि द्रुम फूले फले,
साँचे मणि जटे तहँ सखिन की भीर है। [1]
नेह की कटाक्षन सौं सुभग महल बने,
जेतिक फुहारे नैन तारे अरवीन है॥ [2]
जाकौ सब ध्यान धरैं लोचन अरन अरैं,
यहै राज राजै नित चाह मेरे ही रहै। [3]
[श्री] हरिवंशी-हरिदासी-व्यासी ये खवासी करैं,
प्यारी पातशाह तहँ लालन उजीर है॥ [4]

- ब्रज के कवित्त

जहां की भूमि स्वर्ण के समान है, जहां के वृक्ष, लताएँ प्रेम से झूम रही हैं, एवं फूल-फल खिले हैं। जहां साँचे रतन जटित हैं, वहीं सखियों की भीड़ है। [1]

प्रेम की कटाक्षों से सुंदर महल बना हुआ है जहां अरबों फव्वारे हैं, जो एक से एक आकर्षक है। [2]

जिस महल को समस्त रसिक भक्त ध्यान कर रहे हैं एवं जो उनके आँखों में समय हुआ है, वही महल की चाह मेरा ह्रदय भी नित्य बनाया हुआ है। [3]

[श्री] हरिवंशी, हरिदासी, एवं व्यासी जहां नित्य सेवा पारायण हैं, जहाँ प्यारीजू [श्री राधा] बादशाह हैं एवं श्री लालजी (श्री कृष्ण) वज़ीर (मंत्री) हैं। [4]