मन तू बड़े ठिकाने ठौर ।
कहाँ तू कहाँ यहै वृन्दावन, जिहि सम महत न और ॥ [1]
भ्रमत फिरे मिथ्या जग लालच, करे जु दौरा दौर।
अजहूँ चेत विचार सकल तज, भज रसिकनि सिरमौर ॥ [2]
बिन हरिवंश कृपा को बसि है, भानु सुता की पौर ।
विमल चरण रज सेवी निसिदिन, वन वसि साँवल गौर ॥ [3]
- श्री विमलबाई
अरे मन! तू अब अत्यंत दिव्य स्थान पर पहुँच गया है। कहाँ तू है और कहाँ यह वृंदावन है जिससे श्रेष्ठ कोई अन्य धाम नहीं। [1]
तू संसार के मिथ्या लालच से भरकर दिन-रात भ्रमण कर रहा था। लेकिन अब सचेत हो जा, समस्त मायाजनित कामनाओं को त्याग कर, रसिकों की सिरमौर जोड़ी का ही अनन्य भजन कर। [2]
श्री हित हरिवंश जी की कृपा के बिना, कौन इस भानुसुता की नगरी (श्री राधा के वृंदावनधाम) में वास कर सकता है? अतः उन्हीं श्री राधारानी के चरणों की परम पावन रज का दिन-रात सेवन कर, और श्याम-गौर वर्ण जोड़ी (श्री राधा कृष्ण) के संग उन्मत्त होकर वास कर। [3]
कहाँ तू कहाँ यहै वृन्दावन, जिहि सम महत न और ॥ [1]
भ्रमत फिरे मिथ्या जग लालच, करे जु दौरा दौर।
अजहूँ चेत विचार सकल तज, भज रसिकनि सिरमौर ॥ [2]
बिन हरिवंश कृपा को बसि है, भानु सुता की पौर ।
विमल चरण रज सेवी निसिदिन, वन वसि साँवल गौर ॥ [3]
- श्री विमलबाई
अरे मन! तू अब अत्यंत दिव्य स्थान पर पहुँच गया है। कहाँ तू है और कहाँ यह वृंदावन है जिससे श्रेष्ठ कोई अन्य धाम नहीं। [1]
तू संसार के मिथ्या लालच से भरकर दिन-रात भ्रमण कर रहा था। लेकिन अब सचेत हो जा, समस्त मायाजनित कामनाओं को त्याग कर, रसिकों की सिरमौर जोड़ी का ही अनन्य भजन कर। [2]
श्री हित हरिवंश जी की कृपा के बिना, कौन इस भानुसुता की नगरी (श्री राधा के वृंदावनधाम) में वास कर सकता है? अतः उन्हीं श्री राधारानी के चरणों की परम पावन रज का दिन-रात सेवन कर, और श्याम-गौर वर्ण जोड़ी (श्री राधा कृष्ण) के संग उन्मत्त होकर वास कर। [3]

