(राग ठुमरी)
श्रीवृन्दावन वासी हैं हम, श्रीवृन्दावन वासी हैं हम ।
देवी देव पितर नहीं जानें, संतन चरन उपासी हैं हम ॥ [1]
सेव्य हमारे किशोरी वल्लभ, श्रीराधे जू की दासी हैं हम ।
कृष्णअली की सरन पाइकैं, ‘प्रेमसखी’ सुखरासी हैं हम ॥ [2]
- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (105)
हम श्री वृंदावन के वासी हैं । हम किसी अन्य देवी, देवता एवं पितर को नहीं जानते, हम तो संतों के चरणों के उपासक हैं । [1]
हमारे सेव्य दिव्य दंपति श्री किशोरी वल्लभ (श्री राधा कृष्ण) हैं एवं हम श्री राधाजू की अनन्य दासी हैं । श्री प्रेमसखी कहती हैं कि श्री कृष्णअली जी की शरण प्राप्त कर, वे अपार सुख को प्राप्त हो गई हैं । [2]
श्रीवृन्दावन वासी हैं हम, श्रीवृन्दावन वासी हैं हम ।
देवी देव पितर नहीं जानें, संतन चरन उपासी हैं हम ॥ [1]
सेव्य हमारे किशोरी वल्लभ, श्रीराधे जू की दासी हैं हम ।
कृष्णअली की सरन पाइकैं, ‘प्रेमसखी’ सुखरासी हैं हम ॥ [2]
- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (105)
हम श्री वृंदावन के वासी हैं । हम किसी अन्य देवी, देवता एवं पितर को नहीं जानते, हम तो संतों के चरणों के उपासक हैं । [1]
हमारे सेव्य दिव्य दंपति श्री किशोरी वल्लभ (श्री राधा कृष्ण) हैं एवं हम श्री राधाजू की अनन्य दासी हैं । श्री प्रेमसखी कहती हैं कि श्री कृष्णअली जी की शरण प्राप्त कर, वे अपार सुख को प्राप्त हो गई हैं । [2]

