प्रीति की रीति रसिकनी जानैं - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (24)

प्रीति की रीति रसिकनी जानैं - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (24)

प्रीति की रीति रसिकनी जानैं ।
या ही ते लालन कौं तोषत, पोषत नित नैंकहु मान न ठानैं ॥ [1]
अति अनुराग बढ़ावत छिन-छिन, राखत रसिक लुभानैं ।
(जैश्री) वंशीअलि ललिता की कान सौं, करत सरस सनमानैं ॥ [2]

- श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (24)

प्रीति की रीति तो परम रसिकनी श्री राधा ही जानती हैं । इसी कारण वे अपने प्रियतम को सदा संतुष्ट रखती एवं एक क्षण को भी मान नहीं ठानकर सदा उनका पोषण करती रहती हैं । [1]

वह निरंतर अपने प्रियतम के प्रेम को बढ़ाती हैं एवं उन्हें लुभा कर रखती हैं। श्री वंशी अली कहते हैं कि श्री राधा सदा ललिता जी को अपने प्रियतम के सरस गुणों का गान सुनाती रहती हैं । [2]