मन बच कर्म दुर्गम सदा- श्रीभट्ट देवाचार्य, युगल शतक (29)

मन बच कर्म दुर्गम सदा- श्रीभट्ट देवाचार्य, युगल शतक (29)

मन बच कर्म दुर्गम सदा, ताहि व चरण छुबात ।
राधे तेरे प्रेम की, कहि आवत नहिं बात॥

- श्रीभट्ट देवाचार्य, युगल शतक (29)

हे राधे! मन, वाणी एवं कर्म से भी जिनका दर्शन संभव नहीं, जो हर प्रकार से अति दुर्लभ हैं, वे प्रियतम भगवान श्रीकृष्ण तुम्हारे चरणों में अपना सिर रखते हैं। सचमुच ही राधे! तुम्हारे प्रेम की बात निराली है, जो कहते ही नहीं बनती।