अहो विहारिन प्राण जीवनी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (16)

अहो विहारिन प्राण जीवनी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (16)

(राग परज वा खम्माच)
अहो विहारिन प्राण जीवनी, मो औगन मन में न विचारो । [1]
करुणासिन्धु जान निज दासी, दीन दशा मेरी निरवारो ॥ [2]
निजपन सुमिरौ स्वामिनी भामिनी, बिगड़ी को अब वेग सम्हारो । [3]
ललित लड़ैती घटै न बल कछु, कृपा विलोकनि नैक निहारो ॥ [4]

- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (19)

हे मेरी प्राण-प्यारी श्री विहारिणी जू (श्री राधा)! कृपा कर मेरे अवगुणों पर विचार न कीजिए। [1]

आप तो करुणासिंधु हो, मुझे अपनी दासी जानकर, मेरी इस दयनीय दशा का निवारण कीजिए। [2]

आप अपने परम करुणामय स्वभाव की ओर विचार कर, शीघ्र ही मेरा उद्धार करें। [3]

श्री ललित लड़ैती कहते हैं कि यदि आप मुझ पर अपनी थोड़ी सी करुणा दृष्टि डाल देंगी तो आपका कुछ घटेगा नहीं, परंतु मेरा कल्याण हो जाएगा। [4]