नंद-नंदन की बलि-बलि जैये - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (234)

नंद-नंदन की बलि-बलि जैये - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (234)

(राग केदारौ)
नंद-नंदन की बलि-बलि जैये।
श्याम मृदुल कलेवर की छवि, देख - देख सुख पैये ॥ [1]
सकल लोक-पति, श्रीपति ठाकुर, रसना रसिक-बिमल जसु गैये।
'कुम्भनदास' प्रभु गिरिवर-धर को, तनु-मनु सरबसु दैये॥ [2]

- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (234)

नंदनंदन श्री कृष्ण पर बार-बार बलिहारी जाइए । श्यामसुंदर की मनोहर छवि को निहार-निहार कर सुख का पान कीजिए। [1]

जो समस्त लोकों के स्वामी, श्रीपति ठाकुर हैं, उनका विमल यश रसिकों की रसना सदा गान करती रहती है। श्री कुम्भनदास जी प्रभु गोवर्धनधारी श्री कृष्ण पर अपना तन-मन न्यौछावर कर रहे हैं। [2]