जगत में पैसन ही की माँड - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रन्थ (पूर्वार्ध) (3)

जगत में पैसन ही की माँड - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रन्थ (पूर्वार्ध) (3)

(राग सारंग)
जगत में पैसन ही की माँड ।
पैसन बिना गुरू को चेला, खसमै छांड़ै राँड़॥ [1]
जप, तप, जोग, बिराग, ज्ञान कौं पैसन राखी चाँड़ ।
धीरज, धर्म, बिबेक, सौचता दई पंडितन छाँड़ ॥ [2]
संत, महंत, गाँव के आमिल करत प्रजा कौ डाँड़ ।
भगवतरसिक संग बिन सबकी, कीन्हीं कलियुग भाँड़ ॥ [3]

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (3)

इस संसार में धन-दौलत का ही एक मात्र महत्त्व और प्रभुत्व है। धन न रहने पर शिष्य गुरु को छोड़ देता है और स्त्री पति का परित्याग कर देती है। [1]

जप, तप, योग, वैराग्य और ज्ञान—सब को धन ने निर्मूल और बेअसर कर दिया है। धन के पीछे पंडितों ने अपने स्वाभाविक और अनिवार्य गुण—धैर्य, धर्म, विवेक और पवित्रता—को ताक पर रख दिया है। [2]

संत-महंतों से लेकर गाँव के मुखिया तक—सब जनता से धन ऐंठने में लगे हुए हैं। श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि सत्संग के अभाव में इस कलियुग ने सबको भाँड़—खेल-तमाशा दिखाकर जीविका चलाने वाला बना दिया है। [3]