कह ‘मलूक' हम जबहिं ते, लीन्हों हरि की ओट ।
सोबत हो सुख नींद भरि, डारी भरम की पोट ॥
- श्री मलूक दास
मलूकदास जी कहते हैं कि जबसे प्रभु की शरण ली है, तभी से सुख पूर्वक सोया हूँ अर्थात् पूर्ण रूप से निश्चिंत हो गया हूँ । सब प्रकार के संदेहों एवं चिंताओं की गठरी फेंक कर आनंदमग्न हो कर जी रहा हूँ ।
सोबत हो सुख नींद भरि, डारी भरम की पोट ॥
- श्री मलूक दास
मलूकदास जी कहते हैं कि जबसे प्रभु की शरण ली है, तभी से सुख पूर्वक सोया हूँ अर्थात् पूर्ण रूप से निश्चिंत हो गया हूँ । सब प्रकार के संदेहों एवं चिंताओं की गठरी फेंक कर आनंदमग्न हो कर जी रहा हूँ ।

