नेकहु मन ते होत न न्यारी ।
निसिदिन नैननि माहिं बस रही, जित देखौं तित तू ही प्यारी ॥ [1]
एपै तो बिन विकल रहत मन, जल बिन जैसे मीन दुखारी ।
बिछुरे चैन कहौ क्यों पावै, प्रेमदासि हित शरण तिहारी ॥ [2]
- श्री हित प्रेमदासी जी
हे प्यारी जू [श्री राधे], आपकी छवि मेरे मन से एक पल के लिए भी विलग नहीं होतीं। दिन-रात, हर समय आप मेरी आँखों में बसी रहती हैं; जहाँ भी दृष्टि डालती हूँ, बस आपको ही देखती हूँ। [1]
यदि आप एक क्षण के लिए भी मुझसे दूर हो जाएँ, तो मैं बेचैन हो उठती हूँ, जैसे बिना पानी के मछली तड़पती है। आप ही बताइए, आपसे दूर होकर मुझे चैन कैसे मिलेगा? श्री हित प्रेमदासी तो आपकी शरण में रहती है। [2]
निसिदिन नैननि माहिं बस रही, जित देखौं तित तू ही प्यारी ॥ [1]
एपै तो बिन विकल रहत मन, जल बिन जैसे मीन दुखारी ।
बिछुरे चैन कहौ क्यों पावै, प्रेमदासि हित शरण तिहारी ॥ [2]
- श्री हित प्रेमदासी जी
हे प्यारी जू [श्री राधे], आपकी छवि मेरे मन से एक पल के लिए भी विलग नहीं होतीं। दिन-रात, हर समय आप मेरी आँखों में बसी रहती हैं; जहाँ भी दृष्टि डालती हूँ, बस आपको ही देखती हूँ। [1]
यदि आप एक क्षण के लिए भी मुझसे दूर हो जाएँ, तो मैं बेचैन हो उठती हूँ, जैसे बिना पानी के मछली तड़पती है। आप ही बताइए, आपसे दूर होकर मुझे चैन कैसे मिलेगा? श्री हित प्रेमदासी तो आपकी शरण में रहती है। [2]

