रूप सुधा भोजन जिनको री - श्री अलबेली अली

रूप सुधा भोजन जिनको री - श्री अलबेली अली

रूप सुधा भोजन जिनको री ।
ते क्यों और नयन भरि देखें, दरस अहार पऱयो जिनकोरी ॥ [1]
नेही नेह बिना नाँहि जानत, चातक स्वांति बिना कनकोरी ।
‘अलबेली अली’ रसिकन जीवन, नैननि नैन मिलन इनकोरी ॥ [2]

- श्री अलबेली अली

जिन प्रेमी रसिकों के लिए रूप-सुधा का पान ही आहार है, वे अपने प्रियतम के दर्शन के अतिरिक्त किसी और को क्यों निहारेंगे? [1]

जैसे चातक स्वाति की बूँद के बिना कुछ और ग्रहण नहीं करता उसी प्रकार प्रेमीजन प्रेम के अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते । श्री अलबेली अलि कहते हैं कि जब प्रिया-प्रियतम के नैनों से नैन मिलते हैं, तो वही रसिकों का सच्चा जीवन होता है। [2]