तात मिलै पुनि मात मिलै - श्री सुंदर जी

तात मिलै पुनि मात मिलै - श्री सुंदर जी

(सवैया)
तात मिलै पुनि मात मिलै, सुत भ्रात मिलै युवती सुखदाई। [1]
राज मिलै गज बाजि मिलै, सब साज मिलै मन वांछित पाई॥ [2]
यह लोक मिलै सुर लोक मिलै, बिधि लोक मिलै बैकूण्ठहु जाई। [3]
सुन्दर और मिलै सब ही सुख, सन्त समागम दुर्लभ भाई॥ [4]

- श्री सुंदर जी

किसी को सज्जन कुल, माता-पिता का स्नेह, भाई का साथ और रूपवती संगिनी का प्रेम मिलता है। [1]

किसी को राज्य, हाथी, घोड़े, समस्त विलासिताएँ और मनवांछित भोग प्राप्त होते हैं। [2]

किसी को इस संसार के सुख, स्वर्गलोक, ब्रह्मलोक, और यहाँ तक कि वैकुंठ भी प्राप्त हो जाता है। [3]

परंतु, हे भाई, इस संसार में संतों का संग अति दुर्लभ और अमूल्य है, जिसके समान अन्य कुछ भी नहीं है। [4]