(राग सारंग)
अनन्य नृपति श्रीस्वामी हरिदास।
कुंजबिहारी सेये बिनु जिनि, छिन न करी काहूकी आस॥ [1]
सेवा सावधान अति जानि, सुघर गावत दिन रस रास।
ऐसौ रसिक भयौ नहिं ह्वै है, भुवमंडल आकास ॥ [2]
देह विदेह भए जीवत ही, विसरे बिस्व बिलास।
वृंदाबन रेनु तन मन भजि, तजि लोक वेद की त्रास॥ [3]
प्रीति रीति कीनी सबहिन सौं, किये न खास खवास।
अपनौ व्रत यह ओर निभायो, जौलौं कंठ उसास॥ [4]
सुरपति भुवपति कंचन कामिनी, जिनके भायैं घास।
अबके साधु 'व्यास' हमहूँ से, जगत करत उपहास॥ [5]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (70)
श्री स्वामी हरिदास जी अनन्य रसिक प्रेमियों में सर्वोच्च सम्राट के समान हैं। वृंदावन के एकांत कुंजों में श्री कुंज बिहारी-बिहारीणी के अतिरिक्त उन्होंने न तो कहीं और दृष्टि डाली और न ही किसी अन्य से आशा की, चाहे वो कोई भी हो। [1]
स्वामी श्री हरिदास जी अपनी सेवा में सदा सावधान और सतर्क रहते थे। सेवा करते समय वे इतने सचेत रहते थे कि कभी भी भावावेश में आकर अपनी सेवा में विघ्न नहीं डालते थे। इसके विपरीत, जब श्यामा कुंज बिहारी प्रेम में संलग्न होकर सुधि-बुधि खो बैठते थे, तो उस समय श्री स्वामीजी ही उनकी ध्यानपूर्वक सेवा करते थे। वे सदा युगल जोड़ी की एकांतिक प्रेममयी क्रीड़ाओं का ही गान करते थे और कभी किसी अन्य विषय का गान नहीं करते थे। ऐसा अनन्य रसिक इस भूमंडल पर अथवा अन्य किसी लोक में न तो कभी हुआ है और न ही आगे कभी होगा। [2]
वे जीवित रहते हुए ही विदेह अवस्था को प्राप्त हो चुके थे, और समस्त सांसारिक वासनाओं और बंधनों को बिसार चुके थे। उन्होंने लोक-वेद के भय को त्यागकर, अपने तन-मन को वृंदावन की दिव्य रज को समर्पित कर दिया था। [3]
उन्होंने बिना किसी से भेदभाव किए, सब को समान रूप से प्रेम किया। उनकी यह दृढ़ प्रतिज्ञा थी कि वे किसी से अपनी सेवा नहीं करवाते थे। उन्होंने यह व्रत अपनी अंतिम सांस तक बनाए रखा। [4]
श्री स्वामीजी के लिए, इंद्रपद, सम्राट, धन अथवा कामिनी स्त्री आदि का आकर्षण एक सूखी घास के समान था (अर्थात् स्वप्न में भी नहीं था)। श्री हरिराम व्यासजी महाराज विनम्रता पूर्वक कहते हैं कि स्वामी श्री हरिदास जी महाराज की तुलना में तथाकथित साधु या संत (जैसे हम सब) संतत्व के आदर्श पर भी खरे नहीं उतरते। [5]
अनन्य नृपति श्रीस्वामी हरिदास।
कुंजबिहारी सेये बिनु जिनि, छिन न करी काहूकी आस॥ [1]
सेवा सावधान अति जानि, सुघर गावत दिन रस रास।
ऐसौ रसिक भयौ नहिं ह्वै है, भुवमंडल आकास ॥ [2]
देह विदेह भए जीवत ही, विसरे बिस्व बिलास।
वृंदाबन रेनु तन मन भजि, तजि लोक वेद की त्रास॥ [3]
प्रीति रीति कीनी सबहिन सौं, किये न खास खवास।
अपनौ व्रत यह ओर निभायो, जौलौं कंठ उसास॥ [4]
सुरपति भुवपति कंचन कामिनी, जिनके भायैं घास।
अबके साधु 'व्यास' हमहूँ से, जगत करत उपहास॥ [5]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (70)
श्री स्वामी हरिदास जी अनन्य रसिक प्रेमियों में सर्वोच्च सम्राट के समान हैं। वृंदावन के एकांत कुंजों में श्री कुंज बिहारी-बिहारीणी के अतिरिक्त उन्होंने न तो कहीं और दृष्टि डाली और न ही किसी अन्य से आशा की, चाहे वो कोई भी हो। [1]
स्वामी श्री हरिदास जी अपनी सेवा में सदा सावधान और सतर्क रहते थे। सेवा करते समय वे इतने सचेत रहते थे कि कभी भी भावावेश में आकर अपनी सेवा में विघ्न नहीं डालते थे। इसके विपरीत, जब श्यामा कुंज बिहारी प्रेम में संलग्न होकर सुधि-बुधि खो बैठते थे, तो उस समय श्री स्वामीजी ही उनकी ध्यानपूर्वक सेवा करते थे। वे सदा युगल जोड़ी की एकांतिक प्रेममयी क्रीड़ाओं का ही गान करते थे और कभी किसी अन्य विषय का गान नहीं करते थे। ऐसा अनन्य रसिक इस भूमंडल पर अथवा अन्य किसी लोक में न तो कभी हुआ है और न ही आगे कभी होगा। [2]
वे जीवित रहते हुए ही विदेह अवस्था को प्राप्त हो चुके थे, और समस्त सांसारिक वासनाओं और बंधनों को बिसार चुके थे। उन्होंने लोक-वेद के भय को त्यागकर, अपने तन-मन को वृंदावन की दिव्य रज को समर्पित कर दिया था। [3]
उन्होंने बिना किसी से भेदभाव किए, सब को समान रूप से प्रेम किया। उनकी यह दृढ़ प्रतिज्ञा थी कि वे किसी से अपनी सेवा नहीं करवाते थे। उन्होंने यह व्रत अपनी अंतिम सांस तक बनाए रखा। [4]
श्री स्वामीजी के लिए, इंद्रपद, सम्राट, धन अथवा कामिनी स्त्री आदि का आकर्षण एक सूखी घास के समान था (अर्थात् स्वप्न में भी नहीं था)। श्री हरिराम व्यासजी महाराज विनम्रता पूर्वक कहते हैं कि स्वामी श्री हरिदास जी महाराज की तुलना में तथाकथित साधु या संत (जैसे हम सब) संतत्व के आदर्श पर भी खरे नहीं उतरते। [5]

