हमता ममता मन भरी, व्यर्थ बजावत गाल - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (15)

हमता ममता मन भरी, व्यर्थ बजावत गाल - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (15)

हमता ममता मन भरी, व्यर्थ बजावत गाल ।
“रूप माधुरी" रसिक की, सबसे न्यारी चाल ॥

- श्री रूप माधुरी, श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (15)

कुछ तथाकथित साधकों की अहंता और सांसारिक ममता मन में ज्यों की त्यों बनी रहती है और ऊपर से वे व्यर्थ में स्वयं को रसिक कहलाने में लगे रहते हैं । श्री रूप माधुरी जी कहते हैं कि वास्तविक रसिकों की चाल तो सबसे न्यारी होती है। वे ऐसे छुपे हुए रहते हैं कि बिना किशोरीजी की कृपा के, उनको कोई पहचान ही नहीं सकता कि वे किस कोटि के रसिक हैं।