राधां ध्यायन् राधिकां वन्दमानाः राधां पश्यन् राधिकामेव श्रवन् ।
राधां गायन् सेवमानश्च राधां राधारण्ये कालमेतं न येयम्॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.49)
मेरी एकमात्र यही इच्छा है कि मैं (सदा) श्रीराधिका का ही ध्यान, श्रीराधिका की ही वन्दना, श्रीराधिका का ही दर्शन, श्रीराधिका की ही कीर्तन-कथाओं का श्रवण, श्रीराधा (नाम एवं गुणों) का ही गान तथा श्रीराधिका की ही सेवा करता हुआ श्रीराधिका के क्रीड़ा-कानन श्रीवृन्दावन में ही अपना यह (जीवन) काल व्यतीत करूँ।
राधां गायन् सेवमानश्च राधां राधारण्ये कालमेतं न येयम्॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.49)
मेरी एकमात्र यही इच्छा है कि मैं (सदा) श्रीराधिका का ही ध्यान, श्रीराधिका की ही वन्दना, श्रीराधिका का ही दर्शन, श्रीराधिका की ही कीर्तन-कथाओं का श्रवण, श्रीराधा (नाम एवं गुणों) का ही गान तथा श्रीराधिका की ही सेवा करता हुआ श्रीराधिका के क्रीड़ा-कानन श्रीवृन्दावन में ही अपना यह (जीवन) काल व्यतीत करूँ।

