या मोहनके मैं रूप लुभानी।
सुंदर वदन, कमल दल लोचन, बाँकी चितवन मंद मुस्कानी ॥ [1]
यमुना के तीरे-तीरे धेनु चरावै, बंशी में गावत मीठी वाणी।
तन-मन-धन गिरिधर पर वारूँ, चरण कमल ‘मीरा’ लपटानी ॥ [2]
- श्री मीराबाई
मैं मोहन (कृष्ण) के सुंदर रूप से मोहित हो चुकी हूँ, जिनका सुंदर मुख है, कमल जैसे नेत्र हैं, जिनकी चितवनी बाँकी है एवं जिनकी मधुर मुस्कान है । [1]
यमुना के तट पर, वे गायों को चराते हैं एवं अपनी बांसुरी में मधुर धुन बजाते हैं। श्री मीराबाई कहती हैं कि मैं अपना तन, मन, और धन गिरिधर को समर्पण करके, उनके श्री चरणों से सदा के लिए लिपट जाना चाहती हूँ । [2]
सुंदर वदन, कमल दल लोचन, बाँकी चितवन मंद मुस्कानी ॥ [1]
यमुना के तीरे-तीरे धेनु चरावै, बंशी में गावत मीठी वाणी।
तन-मन-धन गिरिधर पर वारूँ, चरण कमल ‘मीरा’ लपटानी ॥ [2]
- श्री मीराबाई
मैं मोहन (कृष्ण) के सुंदर रूप से मोहित हो चुकी हूँ, जिनका सुंदर मुख है, कमल जैसे नेत्र हैं, जिनकी चितवनी बाँकी है एवं जिनकी मधुर मुस्कान है । [1]
यमुना के तट पर, वे गायों को चराते हैं एवं अपनी बांसुरी में मधुर धुन बजाते हैं। श्री मीराबाई कहती हैं कि मैं अपना तन, मन, और धन गिरिधर को समर्पण करके, उनके श्री चरणों से सदा के लिए लिपट जाना चाहती हूँ । [2]

