रे मन राधे राधे रटि निशिभोर।
तजि उपाधि साधन संतत, जन्म रहत नित नित्य किशोर ॥ [1]
तन मन एक प्राण प्रीतम संग, रमत विपिनवर जीवन जोर।
दास “किशोर” हुलस परस्पर, परम मित्र चितवत चितचोर ॥ [2]
- श्री किशोर दास
हे मन, निशिदिन राधे राधे रट । समस्त सांसारिक उपाधियों को त्याग कर, निरंतर भक्ति का अभ्यास कर जिससे तुम नित्य किशोर, श्री राधा कृष्ण के सदा अंग-संग ही रहोगे । [1]
श्री वृंदावन की कुंजों में श्री राधा अपने तन एवं मन से अपने प्राण प्रीतम संग, नित्य किशोर अवस्था में सदा विहार करती हैं । श्री किशोर दास कहते हैं कि तुम भी अपने परम प्यारे मित्र (श्री राधा कृष्ण), जो अपनी चितवन से सबके चित्त को चुराने वाले हैं, उनके संग प्रेम भरी लीला में उल्लसित होकर रहो। [2]
तजि उपाधि साधन संतत, जन्म रहत नित नित्य किशोर ॥ [1]
तन मन एक प्राण प्रीतम संग, रमत विपिनवर जीवन जोर।
दास “किशोर” हुलस परस्पर, परम मित्र चितवत चितचोर ॥ [2]
- श्री किशोर दास
हे मन, निशिदिन राधे राधे रट । समस्त सांसारिक उपाधियों को त्याग कर, निरंतर भक्ति का अभ्यास कर जिससे तुम नित्य किशोर, श्री राधा कृष्ण के सदा अंग-संग ही रहोगे । [1]
श्री वृंदावन की कुंजों में श्री राधा अपने तन एवं मन से अपने प्राण प्रीतम संग, नित्य किशोर अवस्था में सदा विहार करती हैं । श्री किशोर दास कहते हैं कि तुम भी अपने परम प्यारे मित्र (श्री राधा कृष्ण), जो अपनी चितवन से सबके चित्त को चुराने वाले हैं, उनके संग प्रेम भरी लीला में उल्लसित होकर रहो। [2]

