(सवैया)
अजहुँ समुझि कछु नाहिं गयौ, भजि रे भजि रे भजि रे हरि कौं। [1]
मन मानि कहौ पीउ अमृत कौं, तजि रे तजि रे तजि रे खर कौं॥ [2]
यह पंथ चलैं तेई पार भये, बहुतैं बहुतैं बहुतैं तरि कौं। [3]
कहा सोवहि जागहि क्यों न ‘कली’, जीति रे जीति रे जीति रे अरि कौं॥ [4]
- श्री कल्याण पुजारी जी, श्री हित कल्याण पुजारी जी की वाणी (219)
आज समझ लो, अभी कुछ भी नहीं खोया है—श्री हरि का भजन करो, भजन करो, भजन करो! [1]
हे मन, भक्ति-रस का पान करो—अपनी मूर्खता को त्याग दो, त्याग दो, त्याग दो! [2]
असंख्य जीव इस मार्ग से पार हो चुके हैं—बहुत, बहुत, बहुत लोग तर चुके हैं। [3]
तुम अब भी क्यों सो रहे हो?—अपने मायिक विकारों को जीत लो, जीत लो, जीत लो! [4]
अजहुँ समुझि कछु नाहिं गयौ, भजि रे भजि रे भजि रे हरि कौं। [1]
मन मानि कहौ पीउ अमृत कौं, तजि रे तजि रे तजि रे खर कौं॥ [2]
यह पंथ चलैं तेई पार भये, बहुतैं बहुतैं बहुतैं तरि कौं। [3]
कहा सोवहि जागहि क्यों न ‘कली’, जीति रे जीति रे जीति रे अरि कौं॥ [4]
- श्री कल्याण पुजारी जी, श्री हित कल्याण पुजारी जी की वाणी (219)
आज समझ लो, अभी कुछ भी नहीं खोया है—श्री हरि का भजन करो, भजन करो, भजन करो! [1]
हे मन, भक्ति-रस का पान करो—अपनी मूर्खता को त्याग दो, त्याग दो, त्याग दो! [2]
असंख्य जीव इस मार्ग से पार हो चुके हैं—बहुत, बहुत, बहुत लोग तर चुके हैं। [3]
तुम अब भी क्यों सो रहे हो?—अपने मायिक विकारों को जीत लो, जीत लो, जीत लो! [4]

