नाहीं और रस की तहाँ खटक कहूँ दिन रात - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (1)

नाहीं और रस की तहाँ खटक कहूँ दिन रात - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (1)

नाहीं और रस की तहाँ, खटक कहूँ दिन रात ।
पोषत प्यारी राधिका, जीवत सामल गात ॥

- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (9)

इस एकांतिक निज महल के रस में प्रिया प्रियतम को रात-दिन नित्य विहार के अतिरिक्त अन्य कोई रस नहीं भाता । यहाँ प्यारी राधिका रस माधुरी से श्री कृष्ण का पोषण करती हैं एवं उनको निहार निहार कर श्यामसुन्दर जीवित रहते हैं ।