सखिरी ! स्यामा स्याम स्वरूप ।
देखत ही मिटि जाय दृगन तन, जनमजनम की धूप ॥ [1]
सदा सनातन इकरस जोरी, उपमा को न अनूप ।
'रूपरसिक' जनके सुखदायक, दोऊ भाँवते भूप ॥ [2]
- श्री रूप रसिक देवाचार्य
हे सखी! श्यामा-श्याम का स्वरूप ऐसा अद्भुत है कि उनके दर्शन मात्र से अनगिनत जन्मों की ताप मिट जाती है। [1]
वे सदा सनातन और एकरस अनूप जोड़ी हैं, जो समस्त तुलना (उपमा) से परे हैं। श्री रूप रसिक जी कहते हैं कि अपने भक्तों के लिए वे समस्त सुखों को देने वाले दो मनभावन सम्राट हैं। [2]
देखत ही मिटि जाय दृगन तन, जनमजनम की धूप ॥ [1]
सदा सनातन इकरस जोरी, उपमा को न अनूप ।
'रूपरसिक' जनके सुखदायक, दोऊ भाँवते भूप ॥ [2]
- श्री रूप रसिक देवाचार्य
हे सखी! श्यामा-श्याम का स्वरूप ऐसा अद्भुत है कि उनके दर्शन मात्र से अनगिनत जन्मों की ताप मिट जाती है। [1]
वे सदा सनातन और एकरस अनूप जोड़ी हैं, जो समस्त तुलना (उपमा) से परे हैं। श्री रूप रसिक जी कहते हैं कि अपने भक्तों के लिए वे समस्त सुखों को देने वाले दो मनभावन सम्राट हैं। [2]

