वेदान्ताः प्रतिपादयन्ति मुखतो नोचेत्ततः किं मम
मन्यन्ते न च शास्त्र गत्र्तपतिता दुस्तर्किणः किं ततः।
नोचेद भागवतानुभूतिपदवीं यातस्ततः किं मम
स्वात्मा वज्रसहस्रविद्ध इव न स्पन्देत वृन्दावनात्॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.6)
श्री वृन्दावन की महिमा वेदान्त-समूह मुख से (मुख्यावृत्ति से) प्रतिपादन न करें तो मेरा क्या? शास्त्र रूप गत्र्त में गिरे हुए कुतार्किक गण यदि श्री वृन्दावन का सम्मान न करें, तो इससे मेरी हानि क्या? एवं इस श्री धाम का माहात्म्य भगवद्-भक्तों के अनुभव-गोचर न हो, तो भी मेरा क्या? किन्तु मेरा शरीर सहस्र व्रजों के द्वारा छेदित-भेदित सा होकर भी श्री वृन्दावन से अन्यत्र किञ्चित् मात्र चालित न हो।
मन्यन्ते न च शास्त्र गत्र्तपतिता दुस्तर्किणः किं ततः।
नोचेद भागवतानुभूतिपदवीं यातस्ततः किं मम
स्वात्मा वज्रसहस्रविद्ध इव न स्पन्देत वृन्दावनात्॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.6)
श्री वृन्दावन की महिमा वेदान्त-समूह मुख से (मुख्यावृत्ति से) प्रतिपादन न करें तो मेरा क्या? शास्त्र रूप गत्र्त में गिरे हुए कुतार्किक गण यदि श्री वृन्दावन का सम्मान न करें, तो इससे मेरी हानि क्या? एवं इस श्री धाम का माहात्म्य भगवद्-भक्तों के अनुभव-गोचर न हो, तो भी मेरा क्या? किन्तु मेरा शरीर सहस्र व्रजों के द्वारा छेदित-भेदित सा होकर भी श्री वृन्दावन से अन्यत्र किञ्चित् मात्र चालित न हो।

