अकथ कहानी प्रेम की जानत लैली खूब - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (33)

अकथ कहानी प्रेम की जानत लैली खूब - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (33)

अकथ कहानी प्रेम की, जानत लैली खूब।
दो तनहूँ जहँ एक ये, मन मिलाइ महबूब॥

- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (33)

प्रेम की कहानी अकथनीय है जिसे प्रेमी ही अच्छे से जानता है । प्रेम वह वरदान है जो उस प्रेमी के तन एवं मन को उसके प्रियतम से मिलाकर एक कर देता है ।