छवि देखी राधारमण की, राधारमण की, राधारमण की।
शीश पे मोर मुकुट की शोभा, कुण्डल की छवि न्यारी॥ [1]
हाथ लकुट कांधे पे कमरिया, अधर पे मुरली बाजे री।
गले वैजन्ती माल विराजे, कमर में करधनी लटकी॥ [2]
हाथों में जिनके बाजूबंद सोहे, मोतिन की लड़ लटकी।
चरणों में जिनके पद्म विराजे, नूपुर की धुन प्यारी॥ [3]
वृन्दावन की कुंज गलिन में, दधि की मटकी पटकी।
दासी की अभिलाष यही है, वृंदावन आऊँ तो अटकी॥ [4]
- ब्रज के लोकगीत
आज मैंने श्री राधारमण जी की सुन्दर छवि देखि, जिनके शीश पर मोर-मुकुट सुशोभित है एवं कानों में कुण्डल शोभित है जिसकी छवि न्यारी है। [1]
श्री राधारमण के हाथ में लकुटी है, कंधे पर काला कम्बल एवं अधरों पर मुरली बज रही है। उनके गले में वैजयंती माला विराजित है एवं कमर में करधनी लटक रही है। [2]
श्री राधारमण के हाथों में बाजूबंद शोभायमान है जिसमे मोतियों की लड़ी लटक रही है। उनके चरणों में कमल विराजमान है एवं नूपुरों की प्यारी धुन निसृत हो रही है। [3]
श्री राधारमण जी वृन्दावन की कुञ्ज गलियों में गोपियों की दधि से भरी मटकी पटक देते हैं। मेरी अभिलाषा यही है कि जब मैं वृन्दावन आऊँ तो श्री राधारमण के प्रेम में अटक जाऊँ। [4]
शीश पे मोर मुकुट की शोभा, कुण्डल की छवि न्यारी॥ [1]
हाथ लकुट कांधे पे कमरिया, अधर पे मुरली बाजे री।
गले वैजन्ती माल विराजे, कमर में करधनी लटकी॥ [2]
हाथों में जिनके बाजूबंद सोहे, मोतिन की लड़ लटकी।
चरणों में जिनके पद्म विराजे, नूपुर की धुन प्यारी॥ [3]
वृन्दावन की कुंज गलिन में, दधि की मटकी पटकी।
दासी की अभिलाष यही है, वृंदावन आऊँ तो अटकी॥ [4]
- ब्रज के लोकगीत
आज मैंने श्री राधारमण जी की सुन्दर छवि देखि, जिनके शीश पर मोर-मुकुट सुशोभित है एवं कानों में कुण्डल शोभित है जिसकी छवि न्यारी है। [1]
श्री राधारमण के हाथ में लकुटी है, कंधे पर काला कम्बल एवं अधरों पर मुरली बज रही है। उनके गले में वैजयंती माला विराजित है एवं कमर में करधनी लटक रही है। [2]
श्री राधारमण के हाथों में बाजूबंद शोभायमान है जिसमे मोतियों की लड़ी लटक रही है। उनके चरणों में कमल विराजमान है एवं नूपुरों की प्यारी धुन निसृत हो रही है। [3]
श्री राधारमण जी वृन्दावन की कुञ्ज गलियों में गोपियों की दधि से भरी मटकी पटक देते हैं। मेरी अभिलाषा यही है कि जब मैं वृन्दावन आऊँ तो श्री राधारमण के प्रेम में अटक जाऊँ। [4]

