धनि धनि लाड़िली के चरन - श्री प्रियाशरण जी

धनि धनि लाड़िली के चरन - श्री प्रियाशरण जी

धनि धनि लाड़िली के चरन। [1]
अति सुकोमल पुष्प जैसे स्वर्ण आभा हरन।
करी जावक चित्र रचना लाल ने निज करन॥ [2]
रूप की लहरें उठें जब नेकु सी होइ मुरन।
ललित दासी प्रिया सहचरि के मनोरथ भरन॥ [3]

- श्री प्रियाशरण जी

श्री राधा के चरण धन्य-धन्य हैं। [1]

जो पुष्प जैसे अति सुकमाल हैं एवं स्वर्ण की आभा का हरण कर रहे हैं। श्री कृष्ण ने अपने कर-कमलों से इन चरणों में जावक एवं चित्र की रचना की है। [2]

श्री राधा के चरण कमलों के थोड़ा सा मुड़ने से ही सुंदरता की विभिन्न तरंगे उठने लगती है। श्री प्रियादासी सहचरी कहती है कि "श्री राधा के चरण कमल मेरे समस्त मनोरथ पूर्ण करने वाले हैं।" [3]