मंद हँसनि मुख कमल की - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (7)

मंद हँसनि मुख कमल की - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (7)

मंद हँसनि मुख कमल की, मुरि चितवनि इहि ओर।
बसि करयौ तिहि भाँमिनी, लै गई प्राँन अकोर॥

- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (7)

अपने मुख-कमल पर मंद-मंद मुस्कान एवं तिरछी चितवन से मेरी ओर निहार कर, श्री राधा ने मुझे अपने वश कर, मेरे प्राणों का हरण कर लिया।