(सवैया)
अम्बर सम्बर बास बसे, घमडे घनघोर घटा घँहराँनी।
जद्दपि कूल करारनि ढाहति, आंनि बहै पुल ही तर पाँनी॥ [1]
श्रीबिहारिनिदासि उपासित यौं, निरनै करि श्रीहरिदास बखाँनी।
सबै परजा ब्रजराज हूँ लौं, सर्वोपरि कुंजबिहारिनि राँनी॥ [2]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (110)
जैसे घनघोर बादल आकाश में छा जाते हैं और फिर जल बरसाते हैं। यद्यपि वह जल नदियों को उमड़ाकर उनके किनारों और टीलों को ढहा देता है, फिर भी वह पुल के नीचे से होकर ही प्रवाहित होता है। उसी प्रकार श्री लालजी (श्रीकृष्ण) अपनी प्रेम रूप माधुरी से भरकर, समस्त मर्यादाओं को तोड़ते हुए सतत चलते हैं। परंतु, वे सर्वोपरि श्री नित्य बिहारिनी जू (श्रीराधा) के प्रेम से वशीभूत होकर, दीन से भी दीन होकर, निरंतर उनके चरणों में पड़े रहने को ही अपने प्राणों का आधार मानते हैं। [1]
श्री बिहारिनदेव जी कहते हैं कि यही सिद्धांत, भली-भाँति निर्णय कर, श्री स्वामी हरिदास जी ने रसिकों के समक्ष सदा प्रकट किया है। यह निश्चय सत्य है कि इस वृंदावन धाम में, यहाँ तक कि ब्रजराज श्रीकृष्ण भी प्रजा स्वरूप ही हैं, और सर्वोपरि एकमात्र कुँजबिहारिनी श्री राधा महारानी का ही एकछत्र राज्य है। [2]
अम्बर सम्बर बास बसे, घमडे घनघोर घटा घँहराँनी।
जद्दपि कूल करारनि ढाहति, आंनि बहै पुल ही तर पाँनी॥ [1]
श्रीबिहारिनिदासि उपासित यौं, निरनै करि श्रीहरिदास बखाँनी।
सबै परजा ब्रजराज हूँ लौं, सर्वोपरि कुंजबिहारिनि राँनी॥ [2]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (110)
जैसे घनघोर बादल आकाश में छा जाते हैं और फिर जल बरसाते हैं। यद्यपि वह जल नदियों को उमड़ाकर उनके किनारों और टीलों को ढहा देता है, फिर भी वह पुल के नीचे से होकर ही प्रवाहित होता है। उसी प्रकार श्री लालजी (श्रीकृष्ण) अपनी प्रेम रूप माधुरी से भरकर, समस्त मर्यादाओं को तोड़ते हुए सतत चलते हैं। परंतु, वे सर्वोपरि श्री नित्य बिहारिनी जू (श्रीराधा) के प्रेम से वशीभूत होकर, दीन से भी दीन होकर, निरंतर उनके चरणों में पड़े रहने को ही अपने प्राणों का आधार मानते हैं। [1]
श्री बिहारिनदेव जी कहते हैं कि यही सिद्धांत, भली-भाँति निर्णय कर, श्री स्वामी हरिदास जी ने रसिकों के समक्ष सदा प्रकट किया है। यह निश्चय सत्य है कि इस वृंदावन धाम में, यहाँ तक कि ब्रजराज श्रीकृष्ण भी प्रजा स्वरूप ही हैं, और सर्वोपरि एकमात्र कुँजबिहारिनी श्री राधा महारानी का ही एकछत्र राज्य है। [2]

