(राग तिलंग त्रिताल)
रे मन श्रीवृन्दावन चल।
यमुना सरस सुखद अति सोहे, नीर बहै कल-कल॥ [1]
जहाँ विराजत राधारानी, लिये सहचरी दल।
हितगोपाल को प्राण-प्रिया के, चरण कमल को बल॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (52)
हे मन, श्री वृन्दावन को चल, जहाँ सरस एवं सुखद श्री यमुना जी अति शोभायमान हैं, जिनका जल कल-कल करता हुआ बहता है। [1]
जहाँ सहचरियों के समूह के मध्य श्री राधारानी विराजती हैं। श्री हित गोपालदास कहते हैं कि "मुझे तो एक मात्र मेरी प्राण प्रिया श्री राधा के चरण-कमलों का ही बल है ।" [2]
रे मन श्रीवृन्दावन चल।
यमुना सरस सुखद अति सोहे, नीर बहै कल-कल॥ [1]
जहाँ विराजत राधारानी, लिये सहचरी दल।
हितगोपाल को प्राण-प्रिया के, चरण कमल को बल॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (52)
हे मन, श्री वृन्दावन को चल, जहाँ सरस एवं सुखद श्री यमुना जी अति शोभायमान हैं, जिनका जल कल-कल करता हुआ बहता है। [1]
जहाँ सहचरियों के समूह के मध्य श्री राधारानी विराजती हैं। श्री हित गोपालदास कहते हैं कि "मुझे तो एक मात्र मेरी प्राण प्रिया श्री राधा के चरण-कमलों का ही बल है ।" [2]

