अजन्म सदा जहाँ जन्मलियो - श्री छबीले वल्लभ गोस्वामी

अजन्म सदा जहाँ जन्मलियो - श्री छबीले वल्लभ गोस्वामी

(सवैया)
अजन्म सदा जहाँ जन्मलियो, भवसिन्धु परे नहीं जीव बिचारो। [1]
चोर बनो जग को रचतावन, रक्षक हूँ जु सँहारन हारो॥ [2]
निसकर्म सुनों श्रुति सो जिहि कों, ब्रजगोपिनसों अनुराग निहारो। [3]
बाँकेबिहारी विराजै 'छबीले' सु, श्री बनराज है धाम हमारो॥ [4]

- श्री छबीले वल्लभ गोस्वामी

वेदों ने जिन श्रीकृष्ण को सदा अजन्मा कहा है, उन श्रीकृष्ण का जहाँ प्राकट्य हुआ, वहाँ का वास करने से जीव कभी भवसिंधु में नहीं फँसता। [1]

संसार को रचने वाले श्रीकृष्ण ने ब्रज में चोर बनकर माखन-चोरी जैसी लीलाएँ कीं। वे सबके रक्षक हैं, जो दुष्टों का संहार करते हैं। [2]

श्रुतियाँ जिन्हें निष्काम कहती हैं, वे श्रीकृष्ण ब्रज में गोपियों के संग प्रेम में बँधे रहते हैं। [3]

श्री छबीले वल्लभ जी कहते हैं कि जहाँ श्री बाँकेबिहारी सदा विराजते हैं, ऐसा दिव्य धाम श्रीवृंदावन ही हमारा निज धाम है। [4]