चिरजीवो मेरे दोउ कुंजबिहारी - श्री रामसखी जी, भक्ति रस मंजरी (7)

चिरजीवो मेरे दोउ कुंजबिहारी - श्री रामसखी जी, भक्ति रस मंजरी (7)

चिरजीवो मेरे दोउ कुंजबिहारी॥ [1]
नित्य केलि वृन्दावन वीथिन,
करियें बलि लालन अरु प्यारी।
नित्य सुहाग भाग आलिन को,
तुम सुख सुखी रहत सब नारी॥ [2]
नित्य खेल होरी हिंडोल को,
नित विहार सुखकारी।
नित्य रहै आनंद घन वर्षा,
रामसखी मनुहारी॥ [3]
- श्री रामसखी जी, भक्ति रस मंजरी (7)

हे मेरे दोनों कुञ्जबिहारी एवं कुञ्जबिहारिणी जू, आप चिरंजीवी रहें। [1]

श्री वृन्दावन की वीथियों में नित्यकेलि लीला करिये, जिसकी मैं बलिहारी जाऊँ । 
सखियों का यह सौभाग्य है कि उनका सुहाग (दम्पति श्री श्यामाश्याम) नित्य है, जिसके सुख में ही वे स्वयं को सुखी अनुभव करती हैं। [2] 

श्री श्यामाश्याम वृन्दावन की निकुंजों में नित्य खेलते हैं, नित्य होली एवं हिंडोल लीला करते हैं, नित्य-विहार लीला करते हैं। श्री रामसखी जी ऐसी प्रार्थना करती हैं कि निकुंज में आनन्दघन रूपी प्रिया प्रियतम सदा ऐसे ही रस का वर्षण करते रहें ।[3]