(कवित्त)
एक ही सिंगार तन एक प्राँन एक मन,
एक ही सरूप कापै परत लखानी है। [1]
एक ही बरन अंग भूषन बसन सुरंग,
एक ही सुभाव प्रेम रंग रस सानी है॥ [2]
एक ही सुदृष्टि सखी नैन सों नैंन जोरें,
एक ही समाज राग रंग सुखदानी है। [3]
नवल निहार दोऊ पटतर कौ न कोऊ,
श्रीबिहारिनिदास किंधौं बिहारिनि रानी है॥ [4]
- श्री नवल देव जी, श्री नवल देव जू की वाणी (8)
हे सखी! श्री श्यामा-श्याम का श्रृंगार एक समान है। उनके तन, मन और प्राण भी एक हैं। दोनों का स्वरूप अद्वितीय है, जिसकी कोई समानता कहीं दिखाई नहीं पड़ती। [1]
दोनों के अंगों में धारण किए गए आभूषण और वस्त्र एक जैसे हैं। स्वभाव भी एक जैसा है, और दोनों प्रेम-रंग के रस में सदा सने रहते हैं। [2]
हे सखी! दोनों की सुंदर दृष्टि एक है और वे नैन से नैन जोड़े रहते हैं। उनकी सभा भी एक है, जहाँ सदा सुखदायक राग-रंग के रस की वर्षा होती रहती है। [3]
श्री नवल देव जी कहते हैं, “जो भी इन्हें निहारता है, वह इनके सौंदर्य की उपमा नहीं दे पाता। फिर भी, श्री बाँके बिहारी (श्री कृष्ण) से कुछ अधिक शोभा श्री बिहारिनीरानी (श्री राधारानी) की प्रतीत होती है।” [4]
दोनों के अंगों में धारण किए गए आभूषण और वस्त्र एक जैसे हैं। स्वभाव भी एक जैसा है, और दोनों प्रेम-रंग के रस में सदा सने रहते हैं। [2]
हे सखी! दोनों की सुंदर दृष्टि एक है और वे नैन से नैन जोड़े रहते हैं। उनकी सभा भी एक है, जहाँ सदा सुखदायक राग-रंग के रस की वर्षा होती रहती है। [3]
श्री नवल देव जी कहते हैं, “जो भी इन्हें निहारता है, वह इनके सौंदर्य की उपमा नहीं दे पाता। फिर भी, श्री बाँके बिहारी (श्री कृष्ण) से कुछ अधिक शोभा श्री बिहारिनीरानी (श्री राधारानी) की प्रतीत होती है।” [4]

