ब्रजमंडल देस दिखाओ रसिया।
तिहारे बिरज में मोर बहुत हैं, कूंकत मोर फटे छतिया॥ [1]
तिहारे बिरज मैं गैया बहुत हैं, पी पी दूध भये पठिया।
तिहारे बिरज में ज्वार काचरो, हरि हरि मूंग उडद किचिया॥ [2]
तिहारे बिरज में बंदर बहुत हैं, सूनो भवन देख धसिया।
पुरुषोत्तम प्रभु की छवि निरखत, तेरे चरनन मेरो मन बसिया॥ [3]
- श्री पुरुषोत्तम जी
हे रसिया श्री कृष्ण, मुझे ब्रज मण्डल दिखा दो। आपके ब्रज में बहुत से मोर हैं, जिनकी कूक से हृदय प्रसन्नता से प्रफुल्लित हो उठता है। [1]
आपके ब्रज में बहुत सारी गायें हैं, जिनका दूध पीकर जीव स्वस्थ हो जाता है। आपके ब्रज में ज्वार, मूंग, और उड़द की हरी-भरी फसलें लहलहाती हैं। [2]
आपके ब्रज में बहुत से बंदर हैं, जो सूना घर देखकर भीतर घुस जाते हैं। श्री पुरुषोत्तमदास कहते हैं, जब मैं अपने प्रभु श्री कृष्ण की छवि देखता हूँ, तो उनके चरण कमलों में मेरा मन बस जाता है। [3]
तिहारे बिरज में मोर बहुत हैं, कूंकत मोर फटे छतिया॥ [1]
तिहारे बिरज मैं गैया बहुत हैं, पी पी दूध भये पठिया।
तिहारे बिरज में ज्वार काचरो, हरि हरि मूंग उडद किचिया॥ [2]
तिहारे बिरज में बंदर बहुत हैं, सूनो भवन देख धसिया।
पुरुषोत्तम प्रभु की छवि निरखत, तेरे चरनन मेरो मन बसिया॥ [3]
- श्री पुरुषोत्तम जी
हे रसिया श्री कृष्ण, मुझे ब्रज मण्डल दिखा दो। आपके ब्रज में बहुत से मोर हैं, जिनकी कूक से हृदय प्रसन्नता से प्रफुल्लित हो उठता है। [1]
आपके ब्रज में बहुत सारी गायें हैं, जिनका दूध पीकर जीव स्वस्थ हो जाता है। आपके ब्रज में ज्वार, मूंग, और उड़द की हरी-भरी फसलें लहलहाती हैं। [2]
आपके ब्रज में बहुत से बंदर हैं, जो सूना घर देखकर भीतर घुस जाते हैं। श्री पुरुषोत्तमदास कहते हैं, जब मैं अपने प्रभु श्री कृष्ण की छवि देखता हूँ, तो उनके चरण कमलों में मेरा मन बस जाता है। [3]

