(कवित्त)
रसिक नृपति चक्र चूड़ामणि साँवरौ,
जुवति मुकुट मणि रानी श्री राधा सी हैं। [1]
मुक्ति जहाँ भरै पानी भाट हैं निगम वानी,
उमा, रमा, ब्रह्मरानी चरन की दासी हैं॥ [2]
सूर शशि पाहरू ओ धर्म कुतवाल जहाँ,
शुक सूत नारद से विरद प्रकासी है। [3]
स्वर्ग अपवर्ग व्यर्थ लेकर करेंगे कहा,
जानते नहीं हो हम वृन्दावन वासी हैं॥ [4]
- श्री हित चतुर्भुजदास, श्री वृन्दावन महिमाष्टक (2)
रसिक चूड़ामणि श्री कृष्ण से जहां के राजा हैं एवं सखियों की मुकुट मणि श्री राधा जहां की महारानी हैं। [1]
ऐसे श्री वृंदावन धाम में मुक्ति भी पानी भरती है और निगमवाणी भाट हैं। उमा, रमा एवं सरस्वती चरणों की दासी हैं। [2]
सूर्य-चन्द्र यहाँ के पहरेदार हैं एवं धर्म इस धाम का कोतवाल है। शुकदेव, सूतजी, नारद आदि इस धाम की सुंदर महिमा को प्रकाशित करते हैं। [3]
श्री हित चतुर्भुज दास जी कहते हैं कि स्वर्ग, अपवर्ग आदि व्यर्थ में हम लेकर क्या ही करेंगे! जान लो हमें कि हम वृंदावन के वासी हैं। [4]
रसिक नृपति चक्र चूड़ामणि साँवरौ,
जुवति मुकुट मणि रानी श्री राधा सी हैं। [1]
मुक्ति जहाँ भरै पानी भाट हैं निगम वानी,
उमा, रमा, ब्रह्मरानी चरन की दासी हैं॥ [2]
सूर शशि पाहरू ओ धर्म कुतवाल जहाँ,
शुक सूत नारद से विरद प्रकासी है। [3]
स्वर्ग अपवर्ग व्यर्थ लेकर करेंगे कहा,
जानते नहीं हो हम वृन्दावन वासी हैं॥ [4]
- श्री हित चतुर्भुजदास, श्री वृन्दावन महिमाष्टक (2)
रसिक चूड़ामणि श्री कृष्ण से जहां के राजा हैं एवं सखियों की मुकुट मणि श्री राधा जहां की महारानी हैं। [1]
ऐसे श्री वृंदावन धाम में मुक्ति भी पानी भरती है और निगमवाणी भाट हैं। उमा, रमा एवं सरस्वती चरणों की दासी हैं। [2]
सूर्य-चन्द्र यहाँ के पहरेदार हैं एवं धर्म इस धाम का कोतवाल है। शुकदेव, सूतजी, नारद आदि इस धाम की सुंदर महिमा को प्रकाशित करते हैं। [3]
श्री हित चतुर्भुज दास जी कहते हैं कि स्वर्ग, अपवर्ग आदि व्यर्थ में हम लेकर क्या ही करेंगे! जान लो हमें कि हम वृंदावन के वासी हैं। [4]

