मथुरा में स्थित बाद ग्राम राधावल्लभ संप्रदाय प्रवर्तक श्री हित हरिवंश महाप्रभु की जन्म भूमि है। इसलिए यह स्थान राधावल्लभ सम्प्रदायानुगत वैष्णवों के लिए एक तीर्थ स्थान है। श्री हित हरिवंश महाप्रभु राधारानी के वंशी एवं निकुंज की हित सजनी सखी के अवतार हैं, जो श्री राधारानी की आज्ञा से भूतल पर निकुंज-रस प्रवाह करने के लिए प्रकट हुए।
एक समय श्री व्यास मिश्र दिल्ली के बादशाह के साथ ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा पर थे, तो बाद ग्राम में ऊँचा टीला एवं कृष्ण सरोवर देख यहीं पड़ाव डाला। इसी स्थान पर उनकी गर्भवती पत्नी तारा ने 1502 ईवी के वैशाख (अप्रैल-मई) के 11वें दिन (मोहिनी-एकादशी) सोमवार को प्रातः शाही सेना शिविर में श्री हित हरिवंश महाप्रभु को जन्म दिया। इससे बाद ग्राम का महत्व बढ़ गया और यह तब से लेकर आज तक आस्था का एक पवित्र स्थान बन गया।
कुछ समय पश्चात् श्री हित हरिवंश महाप्रभु के ज्येष्ठ पुत्र श्री वनचंद्र जी ने यहाँ एक मंदिर का निर्माण कर उसमें श्री राधा नाम सेवा की स्थापना की। पास में ही कृष्ण सरोवर है, जहाँ श्री कृष्ण गोचारण करते समय विश्राम करते थे। वैशाख-शुक्ल एकादशी के दिन यहाँ दूर-दूर से वैष्णव भक्त दर्शन करने आते हैं।
स्थान :
बाद ग्राम मथुरा से 13 km दिक्षीण में दिल्ली-आगरा हाईवे पर स्थित है।
एक समय श्री व्यास मिश्र दिल्ली के बादशाह के साथ ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा पर थे, तो बाद ग्राम में ऊँचा टीला एवं कृष्ण सरोवर देख यहीं पड़ाव डाला। इसी स्थान पर उनकी गर्भवती पत्नी तारा ने 1502 ईवी के वैशाख (अप्रैल-मई) के 11वें दिन (मोहिनी-एकादशी) सोमवार को प्रातः शाही सेना शिविर में श्री हित हरिवंश महाप्रभु को जन्म दिया। इससे बाद ग्राम का महत्व बढ़ गया और यह तब से लेकर आज तक आस्था का एक पवित्र स्थान बन गया।
कुछ समय पश्चात् श्री हित हरिवंश महाप्रभु के ज्येष्ठ पुत्र श्री वनचंद्र जी ने यहाँ एक मंदिर का निर्माण कर उसमें श्री राधा नाम सेवा की स्थापना की। पास में ही कृष्ण सरोवर है, जहाँ श्री कृष्ण गोचारण करते समय विश्राम करते थे। वैशाख-शुक्ल एकादशी के दिन यहाँ दूर-दूर से वैष्णव भक्त दर्शन करने आते हैं।
स्थान :
बाद ग्राम मथुरा से 13 km दिक्षीण में दिल्ली-आगरा हाईवे पर स्थित है।

