मोकों राधा चरन सहारौ - तपस्विनी कृष्णा माँ

मोकों राधा चरन सहारौ - तपस्विनी कृष्णा माँ

मोकों राधा चरन सहारौ।
कोउ कर तीरथ, तप, व्रत, मौनहिं, कोउ चह ब्रह्म विचारौ। [1]
कोउ चह धीरज, धर्म, ध्येय, धन, कोउ चह कुल परिवारौ। [2]
कोउ चह सीमित स्वर्ग-स्वल्प-सुख, कोउ चह कहूँ झखमारौ। [3]
इन बल नहिं डर, डरसौं ‘कृष्णा’, कोटि मुक्ति सुख वारो॥ [4]

- तपस्विनी कृष्णा माँ

मुझे तो केवल श्री राधारानी के चरण-कमलों का ही सहारा है।
कोई तीर्थ करके पुण्य कमाता है, कोई तपस्या करता है, कोई व्रत रखता है, तो कोई मौन धारण करता है, और कोई ब्रह्मभाव में विचारमग्न रहता है। [1]

किसी को धीरज धारण करना है, किसी को धर्म, किसी को लक्ष-प्राप्ति की चाह है, तो किसी को धन की। कोई अपने कुल-परिवार को ही प्रिय मानता है। [2]

किसी को स्वल्प-सुख देने वाला स्वर्ग चाहिए, और कोई यहाँ वहाँ झख मार रहा है । [3]

श्री कृष्णा माँ कहतीं हैं कि "मुझे तो एकमात्र श्री राधारानी के चरण-कमलों का ही सहारा है, जिनपर कोटि-कोटि मुक्ति सुख न्योछावर है एवं जिनके बल से मैं डर से भी नहीं डरती।" [4]