नेष्ठा गर बंधन भये - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (374)

नेष्ठा गर बंधन भये - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (374)

नेष्ठा गर बंधन भये, मझरेंडे आचार।
बिधि निसेध नख सिख भरे, तिनतैं दुर्यौ बिहार॥

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (374)

यदि अन्य अन्य निष्ठाएँ ह्रदय में पड़ी हुई हैं, तो वह निष्ठाएँ ही गले का बंधन बन जाती हैं। जिनका मन आचार-विचार में फँसा हुआ है, जो नख से सिख तक विधि-निषेध से भरे हुए हैं, उनसे तो नित्य विहार रस स्वतः ही दूर हो जाता है।