श्रीवृन्दावन सहज समाज।
नित्य अखंड विसद भूतल पर, राज मनिमय सुनि सखी गाज॥ [1]
आस पास जमुना रस छाई, छिन छिन करति जुगल के काज।
ललितादिक मिलि तान तरंगनि, बाजत विविध भाँतियन बाज॥ [2]
विविध भाँति फूली द्रुम वेली, मनहुँ प्रिया प्रिय सहज विराज।
बरसत सुमन परम सुखदायक, चलत परस्पर रंगनि राज॥ [3]
सारस मोर चकोर कोकिला, बोलत विहंग करत आवाज।
नेति नेति श्रृति सुमृति गावत; रहें जु सबनि कौ है सिरताज॥ [4]
रसनिधि गुननिधिआनन्द को निधि, उपमा को है नहिं आज।
विहरत जहँ नव नागरी निसिदित, निरखत चतुर करत दोऊ राज॥ [5]
- श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, रस के पद (2)
अरी सखी, श्रीधाम वृन्दावन की स्वाभाविक शोभा-सम्पत्ति भी बड़ी मनोहारी है। यह नित्य है, इसका त्रिकाल में कभी विनाश नहीं होता। यह समस्त मायिक दोषों से रहित है और इसी भूतल पर सुशोभित हो रहा है। मणिमाणिक्यों से रचित खचित यहाँ की भूमि बड़ी सुन्दर है। [1]
इसके आस-पास कुण्डलाकार श्रीयमुनाजी सुशोभित हो रही हैं जो प्रतिपल युगल किशोर श्रीश्यामाश्याम का मनभाया कार्य किया करती हैं। ललितादिक सखियाँ मिलकर नाना भांति गान कर रही हैं और विविध प्रकार के वाद्य-यंत्र बजा रही हैं। [2]
द्रुम-वल्लरियाँ उमंग में भर विविध प्रकार के फूलों से फलीभूत लग रही हैं, ऐसा प्रतीत होता है मानों साक्षात् प्रिया-प्रियतम ही उन रूपों में विराज रहे हों। परस्पर हिल-डुल कर ये परम आनन्द को प्रदान करने वाले सुमनों की वृष्टि कर रहे हैं। [3]
सारस, मयूर, चकोर, कोयल आदि बोल रहे हैं। छोटे-छोटे गगन-विहारी पक्षी अपनी मधुर-मधुर ध्वनि से वातावरण को और अधिक स्निग्ध बनाये हुए हैं। श्रुति-स्मृतियाँ इसके स्वरूप-गुण का निर्वचन करने में अपने को असमर्थ पाकर 'नेति नेति' कह विराम ले रही हैं। [4]
यह समस्त धामों का मुकुटमणि है। यह रस की खान है, गुणों का खजाना है और आनंद का सागर है।
अद्यावधि कोई ऐसा नहीं, जिससे इसकी उपमा दी जा सके। यहाँ अहर्निश निरन्तर नित नवकिशोर श्री श्यामा कुंजविहारी विहार-विलास करते रहते हैं। यहाँ इन्हीं नित्यविहारी युगल का राज है। चतुर सहचरी सदा इन्हीं को निरखती रहती है। [5]
नित्य अखंड विसद भूतल पर, राज मनिमय सुनि सखी गाज॥ [1]
आस पास जमुना रस छाई, छिन छिन करति जुगल के काज।
ललितादिक मिलि तान तरंगनि, बाजत विविध भाँतियन बाज॥ [2]
विविध भाँति फूली द्रुम वेली, मनहुँ प्रिया प्रिय सहज विराज।
बरसत सुमन परम सुखदायक, चलत परस्पर रंगनि राज॥ [3]
सारस मोर चकोर कोकिला, बोलत विहंग करत आवाज।
नेति नेति श्रृति सुमृति गावत; रहें जु सबनि कौ है सिरताज॥ [4]
रसनिधि गुननिधिआनन्द को निधि, उपमा को है नहिं आज।
विहरत जहँ नव नागरी निसिदित, निरखत चतुर करत दोऊ राज॥ [5]
- श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, रस के पद (2)
अरी सखी, श्रीधाम वृन्दावन की स्वाभाविक शोभा-सम्पत्ति भी बड़ी मनोहारी है। यह नित्य है, इसका त्रिकाल में कभी विनाश नहीं होता। यह समस्त मायिक दोषों से रहित है और इसी भूतल पर सुशोभित हो रहा है। मणिमाणिक्यों से रचित खचित यहाँ की भूमि बड़ी सुन्दर है। [1]
इसके आस-पास कुण्डलाकार श्रीयमुनाजी सुशोभित हो रही हैं जो प्रतिपल युगल किशोर श्रीश्यामाश्याम का मनभाया कार्य किया करती हैं। ललितादिक सखियाँ मिलकर नाना भांति गान कर रही हैं और विविध प्रकार के वाद्य-यंत्र बजा रही हैं। [2]
द्रुम-वल्लरियाँ उमंग में भर विविध प्रकार के फूलों से फलीभूत लग रही हैं, ऐसा प्रतीत होता है मानों साक्षात् प्रिया-प्रियतम ही उन रूपों में विराज रहे हों। परस्पर हिल-डुल कर ये परम आनन्द को प्रदान करने वाले सुमनों की वृष्टि कर रहे हैं। [3]
सारस, मयूर, चकोर, कोयल आदि बोल रहे हैं। छोटे-छोटे गगन-विहारी पक्षी अपनी मधुर-मधुर ध्वनि से वातावरण को और अधिक स्निग्ध बनाये हुए हैं। श्रुति-स्मृतियाँ इसके स्वरूप-गुण का निर्वचन करने में अपने को असमर्थ पाकर 'नेति नेति' कह विराम ले रही हैं। [4]
यह समस्त धामों का मुकुटमणि है। यह रस की खान है, गुणों का खजाना है और आनंद का सागर है।
अद्यावधि कोई ऐसा नहीं, जिससे इसकी उपमा दी जा सके। यहाँ अहर्निश निरन्तर नित नवकिशोर श्री श्यामा कुंजविहारी विहार-विलास करते रहते हैं। यहाँ इन्हीं नित्यविहारी युगल का राज है। चतुर सहचरी सदा इन्हीं को निरखती रहती है। [5]

