हियके लोचन गड़ी रूपकी चटक विकट है - श्री वृंदावन दास चाचा जी

हियके लोचन गड़ी रूपकी चटक विकट है - श्री वृंदावन दास चाचा जी

हियके लोचन गड़ी रूपकी चटक विकट है।
हा राधा-राधा-राधा यह लगि रही रट है॥ [1]
कहाँ-कहाँ वृषभानुनन्दिनी अहा गई कित।
हिये ललक मुख बलक छबीली छटा गड़ी चित॥ [2]
थरहरत अंग व्याकुल अधिक बौरान प्रेम पुनि-पुनि बढ़ी।
बलि बलित कुँवरि गौरंग हो हित रूप तुम्हारे चित चढ़ी॥ [3]

- श्री वृंदावन दास चाचा जी

(श्री रूपलालजी के साथ एक बार चाचा हित वृंदावन दास जी बरसाना में एक उत्सव में सम्मिलित हुए थे। उत्सव की समाप्ति पर श्री हितरूपलाल जी बरसाना की एक कुंज में लता को पकड़कर श्री वृषभानुनंदिनी के ध्यान में लीन हो गए थे। उनकी अथवा एक रसिक भक्त की स्थिति का बहुत सुंदर वर्णन चाचा हित वृंदावन दास जी ने इस प्रकार किया है।)

हित रूप लालजी की ह्रदय की आँखें श्री राधा के रूप पर अटकी हुई हैं, और उनके ह्रदय की चाह इतनी गहरी है कि कोई उसे समझ नहीं सकता। वे “हा राधा, हा राधा” यही रटते जा रहे हैं। [1]

वे पुकार रहे हैं, “हा वृषभानुनंदिनी, आप कहाँ हो, कहाँ हो, कहाँ चली गईं?” उनके ह्रदय में दर्शन की तीव्र लालसा है, और उनके मुख से उमंग भरी पुकार उमड़ रही है, यद्यपि उनका चित्त छबीली श्री राधा की छवि में तल्लीन है। [2]

भावावेश में उनके अंग कम्पित हो रहे हैं, व्याकुलता बढ़ती जा रही है, और क्षण-क्षण प्रेम का बढ़ाव हो रहा है। चाचा हित वृंदावन दास जी कहते हैं कि कुँवरि गौरांगी श्री राधा पर मैं बार-बार बलिहारी जाता हूँ, जिनके चिंतन में गुरुवर श्री हितरूपलाल जी का चित्त रमा हुए है। [3]