जिनके यह रससार - श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी (197)

जिनके यह रससार - श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी (197)

जिनके यह रससार, आनरस सुन्यौ न भावै।
ते नित ये सुख लहैं, आन सपने नहिं पावै॥

- श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी (197)

जिनके ह्रदय में श्रीधाम वृंदावन का यह सार रस समा गया है, उन्हें किसी अन्य रस की चर्चा सुनना भी सुहाता नहीं है। ऐसे रसिक भक्त नित्य ही इस रस में उन्मत्त रहते हैं और स्वप्न में भी अन्य किसी रस का पान नहीं करते।