(सवैया)
कमला तप साधि अराधति है, अभिलाष-महोदधि-मंजन कै। [1]
हित संपति हेरि हिराय रही, नित रीझ बसी मन-रंजन कै॥ [2]
तिहि भूमि की ऊरध भाग दसा, जसुदा-सुत के पद-कंजन कै। [3]
घनआनंद-रूप निहारन कौं, ब्रज की रज आखिन अंजन कै॥ [4]
- श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (467)
श्री लक्ष्मीजी कठोर तपस्या कर श्रीकृष्ण की आराधना करती हैं, मानो अभिलाषा रूपी महोदधि (समुद्र) में अवगाहन करने के लिए तपस्या कर रही हों। [1]
श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप को निहारकर वे मंत्रमुग्ध हो जाती हैं और उस रूप को अपने हृदय में सदा बसाए रखती हैं, जिससे उन्हें सदा आनंद की अनुभूति होती है। [2]
अहो! उस भूमि का कितना सौभाग्य है, जो यशोदानंदन श्रीकृष्ण के चरण-कमलों के चिन्हों से पावन हुई है। [3]
श्री श्यामसुंदर के रूप को सदैव निहारने के लिए श्री लक्ष्मीजी ब्रज की रज रूपी अंजन को अपने नेत्रों में सदा लगाए रखती हैं। [4]
कमला तप साधि अराधति है, अभिलाष-महोदधि-मंजन कै। [1]
हित संपति हेरि हिराय रही, नित रीझ बसी मन-रंजन कै॥ [2]
तिहि भूमि की ऊरध भाग दसा, जसुदा-सुत के पद-कंजन कै। [3]
घनआनंद-रूप निहारन कौं, ब्रज की रज आखिन अंजन कै॥ [4]
- श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (467)
श्री लक्ष्मीजी कठोर तपस्या कर श्रीकृष्ण की आराधना करती हैं, मानो अभिलाषा रूपी महोदधि (समुद्र) में अवगाहन करने के लिए तपस्या कर रही हों। [1]
श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप को निहारकर वे मंत्रमुग्ध हो जाती हैं और उस रूप को अपने हृदय में सदा बसाए रखती हैं, जिससे उन्हें सदा आनंद की अनुभूति होती है। [2]
अहो! उस भूमि का कितना सौभाग्य है, जो यशोदानंदन श्रीकृष्ण के चरण-कमलों के चिन्हों से पावन हुई है। [3]
श्री श्यामसुंदर के रूप को सदैव निहारने के लिए श्री लक्ष्मीजी ब्रज की रज रूपी अंजन को अपने नेत्रों में सदा लगाए रखती हैं। [4]

