ताके मुख की हौं बलि जाउँ।
सोइ परम सुखी कर में लेत जु मनु श्री राधा नाउँ॥ [1]
मौकों लाल प्यारो लागै श्री राधा गावै।
कुँवरि चरनन में लोटत निसदिन याते सुख उपजावै॥ [2]
जीवन प्राण लाडिली मेरें श्री ललिता सुखदानी।
सखी जूथ मधि राजत स्वामिन जय श्री ‘वंशी’ और न जानी॥ [3]
- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (10)
मैं उन पर बलिहारी जाता हूँ जो श्री राधा का नाम जपते हैं । वही मनुष्य परम रस को प्राप्त करता है जो श्री राधा का नाम जपता है। [1]
मुझे श्री लाल जी (कृष्ण) अति प्रिय हैं, क्योंकि वे भी श्री राधा का नाम जपते हैं। श्री किशोरीजी (श्री राधा) के चरणों कमल में श्री लालजी निरंतर लोटते हुए, परम आनंद का अनुभव करते हैं। [2]
मेरा जीवन और प्राण श्री लाड़ली जी हैं, एवं श्री ललिता जी उनके दिव्य रस को दान करने वाली हैं । श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि समस्त सखियों के यूथ के मध्य में श्री स्वामिनीजी (श्री राधा) विराजती हैं और वे श्री राधा के अतिरिक्त किसी अन्य को नहीं जानते । [3]
सोइ परम सुखी कर में लेत जु मनु श्री राधा नाउँ॥ [1]
मौकों लाल प्यारो लागै श्री राधा गावै।
कुँवरि चरनन में लोटत निसदिन याते सुख उपजावै॥ [2]
जीवन प्राण लाडिली मेरें श्री ललिता सुखदानी।
सखी जूथ मधि राजत स्वामिन जय श्री ‘वंशी’ और न जानी॥ [3]
- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (10)
मैं उन पर बलिहारी जाता हूँ जो श्री राधा का नाम जपते हैं । वही मनुष्य परम रस को प्राप्त करता है जो श्री राधा का नाम जपता है। [1]
मुझे श्री लाल जी (कृष्ण) अति प्रिय हैं, क्योंकि वे भी श्री राधा का नाम जपते हैं। श्री किशोरीजी (श्री राधा) के चरणों कमल में श्री लालजी निरंतर लोटते हुए, परम आनंद का अनुभव करते हैं। [2]
मेरा जीवन और प्राण श्री लाड़ली जी हैं, एवं श्री ललिता जी उनके दिव्य रस को दान करने वाली हैं । श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि समस्त सखियों के यूथ के मध्य में श्री स्वामिनीजी (श्री राधा) विराजती हैं और वे श्री राधा के अतिरिक्त किसी अन्य को नहीं जानते । [3]

