गिरराज कौ वास मिलै नित ही - ब्रज के सवैया

गिरराज कौ वास मिलै नित ही - ब्रज के सवैया

गिरराज कौ वास मिलै नित ही, नित मानसी गंग नहायौ करूँ। [1]
हर देव की देहरी धोक दऊँ, चकलेश्वर सीस नवायौ करूँ॥ [2]
व्रजचन्द सुदर्श अनन्द लऊँ, जगदम्बे पै दीप जरायौ करूँ। [3]
तव 'मोहन' प्रेम पुजारी बनूँ, परिकम्माऊ रोज लगायौ करूं॥ [4]

- ब्रज के सवैया

मेरी यह अभिलाषा है कि मुझे नित्य ही श्री गिरिराजजी का वास मिले, जहाँ मैं प्रतिदिन मानसी गंगा में स्नान करूँ। [1]

मुझे ऐसा अवसर प्राप्त हो कि मैं हरदेव मंदिर की देहरी को धोकर स्वच्छ करूँ और श्री चकलेश्वर महादेव को शीश नवाकर प्रणाम करूँ। [2]

मेरा ऐसा सौभाग्य कब होगा, जब मैं ब्रजवास करते हुए नित्य व्रजचंद्र श्रीकृष्ण के दर्शन का आनंद प्राप्त करूँ और माता जगदंबा के मंदिर में दीपक जलाया करूँ? [3]

हे मनमोहन श्रीकृष्ण! ऐसी कृपा करें कि मैं आपके प्रेम में डूबा हुआ प्रतिदिन गिरिराजजी की परिक्रमा किया करूँ। [4]