यह सुख जो हृदय रहे, तो मिटे मन दाहु।
कहत हैं गदाधर, चित, इत उत नहिं जाहु॥
- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (52.13)
जब श्री प्रिया-प्रियतम का वृंदावन रस हृदय में रहता है, तब वह हृदय की समस्त मलिनताओं एवं विकारों को स्वतः ही भस्म कर देता है, जिसके फलस्वरूप चित्त इधर-उधर विचलित नहीं होता।
कहत हैं गदाधर, चित, इत उत नहिं जाहु॥
- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (52.13)
जब श्री प्रिया-प्रियतम का वृंदावन रस हृदय में रहता है, तब वह हृदय की समस्त मलिनताओं एवं विकारों को स्वतः ही भस्म कर देता है, जिसके फलस्वरूप चित्त इधर-उधर विचलित नहीं होता।

