मन ना रँगाये रँगाये जोगी कपरा।
आसन मारि मंदिर में बैठै,
ब्रह्म-छाँड़ि पूजन लागे पथरा॥ [1]
कनवा फड़ाय जटवा बढ़ौले,
दाढ़ी बढ़ाय जोगी होइ गैले बकरा।
जंगल जाय जोगी धुनिया रमौले,
काम जराय जोगी होय गैले हिजरा॥ [2]
मथवा मुँड़ाय जोगी कपड़ा रँगौले,
गीता बाँच के होय गैले लबरा।
कहहिं ‘कबीर’ सुनो भाई साधो,
जम दरवजवा बाँधल जैबे पकड़ा॥ [3]
- श्री कबीरदास
जोगी के मन में प्रेम का रंग तो नहीं है, उसने केवल कपड़े रंगवा लिए हैं। वह आसन मारकर मंदिर में बैठ तो गया है, परंतु मूर्ति में भगवान की भावना बनाने (एवं सब के ह्रदय में भी भगवान हैं ) के बजाय केवल पत्थर की ही पूजा कर रहा है। [1]
उसने अपने कान छिदवाकर कुंडल पहन लिए हैं, बाल लंबे कर लिए हैं और दाढ़ी बढ़ाकर बकरे जैसा रूप धारण कर लिया है। जोगी जंगल में धूनी रमाने चला गया है, परंतु काम-वासना को दबाते-दबाते वह हिजड़ा बन गया है। [2]
सिर मुंडाकर, कपड़े रंगकर, और गीता पढ़कर बड़ी-बड़ी बातें करने लगा है। सुनो, भाई साधु, कबीर कहते हैं कि बिना शुद्ध प्रेम के इस तरह बाहरी दिखावे एवं पाखंड में लिप्त रहकर, तू यमराज के दरवाजे पर निस्संदेह ही बाँधा हुआ जाएगा। [3]
आसन मारि मंदिर में बैठै,
ब्रह्म-छाँड़ि पूजन लागे पथरा॥ [1]
कनवा फड़ाय जटवा बढ़ौले,
दाढ़ी बढ़ाय जोगी होइ गैले बकरा।
जंगल जाय जोगी धुनिया रमौले,
काम जराय जोगी होय गैले हिजरा॥ [2]
मथवा मुँड़ाय जोगी कपड़ा रँगौले,
गीता बाँच के होय गैले लबरा।
कहहिं ‘कबीर’ सुनो भाई साधो,
जम दरवजवा बाँधल जैबे पकड़ा॥ [3]
- श्री कबीरदास
जोगी के मन में प्रेम का रंग तो नहीं है, उसने केवल कपड़े रंगवा लिए हैं। वह आसन मारकर मंदिर में बैठ तो गया है, परंतु मूर्ति में भगवान की भावना बनाने (एवं सब के ह्रदय में भी भगवान हैं ) के बजाय केवल पत्थर की ही पूजा कर रहा है। [1]
उसने अपने कान छिदवाकर कुंडल पहन लिए हैं, बाल लंबे कर लिए हैं और दाढ़ी बढ़ाकर बकरे जैसा रूप धारण कर लिया है। जोगी जंगल में धूनी रमाने चला गया है, परंतु काम-वासना को दबाते-दबाते वह हिजड़ा बन गया है। [2]
सिर मुंडाकर, कपड़े रंगकर, और गीता पढ़कर बड़ी-बड़ी बातें करने लगा है। सुनो, भाई साधु, कबीर कहते हैं कि बिना शुद्ध प्रेम के इस तरह बाहरी दिखावे एवं पाखंड में लिप्त रहकर, तू यमराज के दरवाजे पर निस्संदेह ही बाँधा हुआ जाएगा। [3]

