(राग कल्यान)
अजहूँ कहा कहति है री मारै नैंन आरनि। [1]
भौंहैं ज्यौं धनुष चितवनि बान बाँफिन
फौंक धरैं कहत स्याम प्यारनि॥ [2]
तू ही जीवन तू ही भूषन तू ही प्रान धन यारनि। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी सौं
मेरु भयौ बिहारनि॥ [4]
- श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (64)
ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी श्री प्रियाजू (श्री राधा) से कहते हैं -
हे प्रियाजू ! आपकी चितवन के प्रहार से लाल (श्री कृष्ण) के हृदय में ऐसी वेदना हो रही है, क्या अब भी कुछ कहना शेष है ? अब क्या कहती हो ? [1]
आपकी भौंहें धनुष जैसी हैं, चितवन बाण है तथा बरौनी (फोंक) तरकस हैं। जैसे कोई बाण से विध कर आर्त स्वर में पुकारता है, उसी प्रकार श्री लाल जी आपको पुकार रहे हैं। [2]
श्री लालजी कह रहे हैं - हे प्यारी ! आप ही मेरी जीवन-प्राण हैं, आप ही आभरण हैं और आप ही मेरी सर्वस्व प्राण-धन हैं, आप से ही मेरी मैत्री है। [3]
यह सुनकर श्री हरिदासीजू की लड़ैती ने श्री लाल को हृदय से लगा कर बिहार का दान दिया। [4]
अजहूँ कहा कहति है री मारै नैंन आरनि। [1]
भौंहैं ज्यौं धनुष चितवनि बान बाँफिन
फौंक धरैं कहत स्याम प्यारनि॥ [2]
तू ही जीवन तू ही भूषन तू ही प्रान धन यारनि। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी सौं
मेरु भयौ बिहारनि॥ [4]
- श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (64)
ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी श्री प्रियाजू (श्री राधा) से कहते हैं -
हे प्रियाजू ! आपकी चितवन के प्रहार से लाल (श्री कृष्ण) के हृदय में ऐसी वेदना हो रही है, क्या अब भी कुछ कहना शेष है ? अब क्या कहती हो ? [1]
आपकी भौंहें धनुष जैसी हैं, चितवन बाण है तथा बरौनी (फोंक) तरकस हैं। जैसे कोई बाण से विध कर आर्त स्वर में पुकारता है, उसी प्रकार श्री लाल जी आपको पुकार रहे हैं। [2]
श्री लालजी कह रहे हैं - हे प्यारी ! आप ही मेरी जीवन-प्राण हैं, आप ही आभरण हैं और आप ही मेरी सर्वस्व प्राण-धन हैं, आप से ही मेरी मैत्री है। [3]
यह सुनकर श्री हरिदासीजू की लड़ैती ने श्री लाल को हृदय से लगा कर बिहार का दान दिया। [4]

