कीरति कें कन्या भई - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (19)

कीरति कें कन्या भई - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (19)

(कवित्त)
कीरति कें कन्या भई आये व्रज गोपी गोप,
नाचैं कूदैं गामैं दधि गोरस लुटावैं हैं। [1]
बीना लै प्रवीन राग गावत रिसीस ठाड़े,
होय हर्ष भोलानाथ डमरू बजावैं हैं॥ [2]
'लाल बलबीर' व्रजराज जी के द्वार आली,
चार मुख बारे चार वेदन सुनावैं हैं। [3]
देवता विमान चढ़े सेवन जनावैं और,
दुंदभी बजावैं गावैं फूल बरषावैं हैं॥ [4]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (19)

महारानी कीरति को एक दिव्य कन्या का जन्म हुआ है, जिनके दर्शन के लिए व्रज के समस्त गोप-गोपीजन उमड़े हुए हैं। सभी हर्ष में नाच रहे हैं, कूद रहे हैं, मंगल गीत गा रहे हैं, और दही-माखन आदि लुटा रहे हैं। [1]

नारदादि ऋषि द्वार पर खड़े होकर वीणा लेकर मधुर राग का गान कर रहे हैं, और भोलेनाथ शिव जी हर्ष में भरकर डमरू बजा रहे हैं। [2]

हे सखी, व्रजराज वृषभानु जी के द्वार पर चार मुखवाले ब्रह्मा चारों वेदों का पाठ कर रहे हैं। [3]

देवतागण अपने-अपने विमानों पर आकाश में दुंदुभि बजा रहे हैं, गान कर रहे हैं, और पुष्पों की वर्षा कर अपनी सेवा प्रकट कर रहे हैं। [4]