रूप में अटके री नैना मेरे।
तेरेइ रँग रंगे निस बासर, भये मोल के चेरे॥ [1]
पलक ओट कोटिक जुग मानत, बीतत कलप घनेरे।
अलबेली अलि हँसि चितवत जब जिवाएँ तेरे॥ [2]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (138)
यह नेत्र श्री राधा की रूप सुधा माधुरी में ही सदा अटके रहते हैं ।उन्हीं के प्रेम रंग में दिन-रात रंगे हुए बिना मोल के दास बने हुए हैं। [1]
श्री राधा के रूपमाधुरी के दर्शन में पलकों के झपकने से जो दर्शन का विलंभ होता है, वह कोटि-कोटि युगों के समान दुखदाई प्रतीत होता है । सहचरी भावपन्न श्री अलबेली अलि कहती हैं कि जब श्री राधा मुस्कुरा कर निहारती हैं तब ऐसा प्रतीत होता है जैसे जीवन दान मिला हो। [2]

